कथा अभ्यास
।। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।। सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णको हम नमस्कार करते हैं, जो जगत्की उत्पत्ति, स्थिति और विनाशके हेतु तथा आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक—तीनों प्रकारके तापोंका नाश करनेवाले हैं ।।१।।
भक्तजनों! आइए, आज हम सब मिलकर परम पावन 'श्रीमद्भागवत' की महिमा का रसपान करें। आज मैं आपको श्रीमद्भागवत माहात्म्य के प्रथम अध्याय—'देवर्षि नारद की भक्ति से भेंट' की दिव्य कथा सुनाता हूँ ।
बंधुओं, नैमिषारण्य के पवित्र क्षेत्र में एक बार शौनक जी ने सूत जी से एक बड़ा ही सुंदर प्रश्न पूछा। उन्होंने कहा कि इस घोर कलि-कालमें जीव प्रायः आसुरी स्वभाव के हो गए हैं, ऐसे में इन जीवों को शुद्ध बनाने का सर्वश्रेष्ठ उपाय क्या है?
तब सूत जी ने श्रीमद्भागवत की महिमा बताते हुए कहा कि यह शास्त्र करोड़ों सूर्यों के समान अज्ञान के अंधकार को नष्ट करने वाला है । कलियुग में जीवों के कालरूपी सर्प का ग्रास होने के त्रास (भय) का आत्यन्तिक नाश करने के लिए ही श्रीशुकदेव जी ने श्रीमद्भागवत शास्त्र का प्रवचन किया था । कल्पवृक्ष तो अधिक-से-अधिक स्वर्गीय सम्पत्ति दे सकता है, परन्तु भागवत कथा तो गुरुदेव की कृपा से साक्षात् भगवान्का वह योगिदुर्लभ नित्य वैकुण्ठधाम प्रदान करा देती है ।
इसकी महिमा इतनी है कि जब शुकदेव जी राजा परीक्षित को यह कथा सुनाने के लिये सभा में विराजमान हुए, तब देवतालोग स्वर्ग का अमृत कलश लेकर आ गए । देवताओं ने कहा कि राजा परीक्षित यह अमृत पी लें और बदले में हमें यह 'कथामृत' दे दीजिये । परन्तु श्रीशुकदेव जी ने देवताओं की हँसी उड़ा दी। विचार कीजिये, इस संसारमें कहाँ काँच और कहाँ महामूल्य मणि? स्वर्ग का अमृत मात्र एक काँच है, और भगवत्कथा वह महामूल्य मणि है जिसके अधिकारी केवल अनन्य भक्त होते हैं, देवता नहीं ।
श्रोतागण! भागवत माहात्म्य के इस प्रथम अध्याय में देवर्षि नारद की एक बड़ी ही मार्मिक कथा है। एक बार नारद जी शांति की खोज में पृथ्वी पर पुष्कर, प्रयाग, काशी आदि कई तीर्थों में विचरते रहे, किन्तु उन्हें कहीं मन को संतोष देने वाली शांति नहीं मिली । उन्होंने देखा कि इस समय अधर्म के सहायक कलियुग ने सारी पृथ्वी को पीड़ित कर रखा है । सत्य, तप, शौच और दया सब लुप्त हो गए हैं और जो साधु-संत कहे जाते हैं वे भी पूरे पाखण्डी हो गये हैं ।
दुःखी होकर देवर्षि नारद यमुना तट पर, परम धन्य वृन्दावन धाम पहुँचे । वहाँ उन्होंने एक बड़ा आश्चर्य देखा—एक खिन्न नवयुवती रो रही थी और उसके पास दो अचेत वृद्ध पुरुष जोर-जोर से साँस ले रहे थे । नारद जी के पूछने पर उस युवती ने अपना परिचय देते हुए कहा, 'मेरा नाम भक्ति है, और ये ज्ञान और वैराग्य नामक मेरे पुत्र हैं' ।
भक्ति महारानी ने बताया कि वह द्रविड़ देश में उत्पन्न हुई और गुजरात में आकर बुढ़ापे ने उसे आ घेरा । परन्तु जैसे ही वह वृन्दावन आई, वृन्दावन के संयोग से वह पुनः परम सुन्दरी नवयुवती हो गयी । किन्तु दुःख इस बात का था कि माता (भक्ति) तो तरुणी हो गई, पर उसके दोनों पुत्र (ज्ञान और वैराग्य) बूढ़े ही रह गए! ऐसा क्यों? क्योंकि इस कलियुग में यहाँ इन दोनों का कोई ग्राहक नहीं है, इसलिए इनका बुढ़ापा नहीं छूट रहा है । आज लोग केवल रस और भावना चाहते हैं, ज्ञान और वैराग्य नहीं।
भक्ति महारानी रोते हुए कहने लगीं कि कलियुग के आते ही सब वस्तुओं का सार न जाने कहाँ चला गया? तब देवर्षि नारद ने उन्हें सांत्वना दी। नारद जी ने कहा कि कलियुग में भले ही अनेक दोष हैं, परन्तु राजा परीक्षित ने इस पापी कलियुग को जीवों के सुख के लिए ही रहने दिया था । इसका कारण यह है कि जो फल तपस्या, योग एवं समाधि से भी नहीं मिलता, कलियुग में वही फल केवल भगवान के 'श्रीहरिकीर्तन' से ही भलीभाँति मिल जाता है!
अतः हे भक्तों, कलियुग का यह स्वभाव ही है, इसमें किसी का दोष नहीं है । हमें कलियुग के दोषों से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। संसार में साधुओं का दर्शन ही समस्त सिद्धियों का परम कारण है । हम सब केवल श्रीमद्भागवत का आश्रय लें और निरंतर श्रीहरि का कीर्तन करें। इसी से हमारे हृदय में बैठी भक्ति पुष्ट होगी और अचेत पड़े ज्ञान और वैराग्य पुनः जागृत हो उठेंगे।
।। बोलिए वृंदावन बिहारी लाल की जय ।। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।।